الجمعة، أبريل 24

على حافة الـ ج ـنون ..!




مشى بخطىً باردة .. ثقيلة .. هزيلة..!
متناسياً دنياه خلفَ 
أبوابِ العقول!
فاغراً في ذهول!!
لا يعملُ في داخله مخٌ ولا قلب!
يمشي بِلا درب!
على حافةِ 
الــ ج ـنون..

بلْ هوى!!


ماهذهِ البشر؟!




ما ذاكَ المستنير؟؟
أظنّهُ القمر..



يق
ولون:
" لا نور له "
كيف لا نور؟!

ماهذا السرور؟
لماذا يضحك؟!
لابد أنه يرى قمراً يشبهه!
ربما يراني =)
بل حتماًً يراني..!

لكن .....

هل يراني كبيــــــراً كما أراه؟!
لا أدري..

لكن .....

أينها عيناه؟!!
لااا..!
يبدو أنه لا يرى..!
إذن !
لماذا يبتسم؟؟!
ربما ليواسيني..!!
ههههههـ

يا أنتْ..
لماذا تبتسمــ؟؟
أهيِ شفقةً بي؟؟؟؟
ههـ .. دعها لك تلكَ الصفراء..!
اغرب!!
=(

أوووووووه
إنهُ الأذان!
هل هذا أذانُ الفجر؟؟؟
وما الفجر؟!
ربما.. هو نهايةُ ذلكَ المستنير..
نعم..
إنه القبر!

ألهذا يبتسم؟؟
لأنه سيُدفنُ الآآآآآآآن؟؟!!
إنَّ أمرهُ عجيب!!

أجزمُ أنَّهُ غبيّ!


يا أنتْ ..
أريدُ أنْ أطلبَ منكَ طلب..

أنا....
لم أقلْ عنكَ غبي!
ولم أقلْ إنَّ أمركَ عجيب!
ولم أقلْ لكَ أغرب!!

بلْ على العكس!


فأنا مبتسمٌ مثلكَ ومسرور..!
صدقني..!!

فهلّا أخذتني معكَ إلى القبر ؟؟؟
بعدَ الفجر؟؟

ياقمر .. ياقمر..
يا أنتْ .. 
انتظر..!!!

حتى ذلكَ الذي لا نور له...

يرفضـــــــــــني
؟!

آآآه
لا ضَيْر .. 

سأنامُ هُنا في غفوةٍ طويــــلة..
لا أريدُ لخيوطِ تلكَ الحارقة..
أن تتسللَ إلى قلبي ..

فتحرقه..!



أووووه ..
أنتِ هناااا؟!
انتظري لأناااااااااام !
لميّ الخيوووووووط!
فلا يأخذ نومي سوى الدقيقتين..!
وأعدُكِ ..
لن أصحو بحرقتكِ..!

وحطَّ رحالهُـ وغابَ في سباتٍ أبدي..!!

لاحقاً
 بمن جفاهـ..!


ليست هناك تعليقات:

إرسال تعليق